भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकार

भाग 3

मौलिक अधिकार

अनुच्छेद(12 से 35)

  1.  समानता का अधिकार
  2.  स्वतंत्रता का अधिकार (विचारों की अभिव्यक्ति)
  3.  शोषण से रक्षा का अधिकार 
  4.  धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार
  5.  संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार 
  6.  संवैधानिक उपचारों का अधिकार

ऐतिहासिक विकास

सन 1858 ई. में विक्टोरिया घोषणा पत्र में ब्रिटिश द्वारा घोषित भारतीय नागरिकों को भारत में मूल अधिकार लागू करने का प्रस्ताव पास हुआ।

उसके बाद प्रथम अधिकारिक मांग सन 1925 ई. में कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिया बिल में एनी बेसेंट ने मूल अधिकारों की मांग रखी थी ।

सन 1928  ई. में नेहरू रिपोर्ट यानी कि मोतीलाल नेहरू की रिपोर्ट में 19 मूल अधिकारों का वर्णन किया गया था जिनमें से 10 मूल अधिकारों को भारतीय संविधान में शामिल कर लिया गया।

 सन 1931 ईस्वी में कराची अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता सरदार वल्लभभाई पटेल ने की थी इसमें कांग्रेस के घोषणा पत्र में मूल अधिकारों की मांग की मूल अधिकारों का प्रारूप जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था।


मौलिक अधिकार हमारे संविधान के भाग 3 में मूल अधिकार के नाम से जाने जाते हैं और अनुच्छेद 12 से लेकर अनुच्छेद 35 हमारे संविधान में दर्शाए गए हैं

अब चर्चा करते हैं सभी मूल अधिकारों के बारे में हमारे संविधान में पहले 7 मूल अधिकार थे अब  6 मूल अधिकार हैं
भाग-3 को भारत का अधिकार पत्र (मैग्नाकार्टा) कहा जाता है जिसे मूल अधिकारों का जन्मदाता भी कहा जाता है


मूल अधिकारों के प्रकार


संविधान में पहले 7 मूल अधिकार थे अब संपत्ति के मूल अधिकार को हटाकर 6 मूल अधिकार हैं  

44 वां संशोधन अधिनियम 1978

सन 1978 में 44 वां संशोधन हुआ जिसे 44 वां संशोधन अधिनियम 1978 के नाम से जाना गया इसके तहत संपत्ति के मूल अधिकार को हटा दिया गया और इस संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में हटाकर केवल विधिक अधिकार बना दिया गया 
और यह भी सुनिश्चित किया गया की संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची से हटाने से अल्पसंख्यकों के अपनी पसंद के शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने और संचालन संबंधी अधिकारों पर कोई प्रभाव न पड़े

NOTE

       परिभाषा अनुच्छेद 12 में मौलिक अधिकारों की               परिभाषा दी हुई है 

       अनुच्छेद 13 में मूल अधिकारों से असंगत या                   उनका अल्पीकरण करने वाली विधियां दी गई है


अब हम छह मौलिक अधिकारों को अनुच्छेदों के आधार पर एक-एक करके चर्चा करेंगे ।

1 अनुच्छेद (14 से 18 तक)   समानता  का अधिकार 

 इसमें अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 तक दिए गए है 


अनुच्छेद 14     विधि के समक्ष समता और विधि का                            समान संरक्षण 


  अनुच्छेद 14 में बताया गया है कि राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा एक नागरिकों को समान न्याय मिलेगा

इस अनुच्छेद में एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून के समक्ष समानता का अधिकार डायसी के विधि के शासन के सिद्धांत पर आधारित है इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति राष्ट्र के कानून से ऊपर नहीं है

इस main भी कुछ अपवाद हैं

मूल रूप से 6 बतों पर जोर दिया जा रहा है इस को ध्यान से पढ़ें

भारत का राष्ट्रपति या किसी भी राज्य का राज्यपाल अपने पद संबंधी शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और निष्पादन के लिए किसी न्यायालय के प्रति जवाबदेह नहीं है अनुच्छेद 361(१) में यह बात कही गई है यहां पर समानता का अधिकार कार्य नहीं करता है

राष्ट्रपति या राज्यपाल के खिलाफ उसके कार्यालय के दौरान कोई भी आपराधिक कार्यवाही न तो शुरू की जाएगी और ना ही जारी रखी जाएगी यह बात अनुच्छेद 361(२)में कही गई है यह भी समानता के अधिकार का अपवाद है

विदेशों के प्रमुख और राजदूत दीवानी और फौजदारी कार्यवाही ओं से पूरी तरह मुक्त है

संयुक्त राष्ट्र और इसकी संस्थाओं को कूटनीतिक उनमूक्ति का अधिकार प्राप्त है

सांसद या विधायक संसद के भीतर किए गए किसी भी कार्य या कहीं गई किसी भी बात के संबंध में जवाबदेह नहीं है

दीवानी कार्यवाही राष्ट्रपति या राज्यपाल को लिखित में सूचना देने के 2 महीने बाद शुरू की जा सकती है यह बात 361(4)अनुच्छेद में कही गई है



अनुच्छेद 15   धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म                                स्थान के आधार पर विविध का प्रतिशेध।


                  अनुच्छेद 15 यह कहता है कि राज्य किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म मूल वंश जाति लिंग या जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा
अनुच्छेद की कोई बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेग
अनुच्छेद 15 की या अनुच्छेद 29 के खंड 2 की कोई बात राज्य को सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए नागरिकों के किन्ही वर्गों को उन्नति के लिए या अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी

अपवाद
इस अनुच्छेद में एक अपवाद है जो अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान यानी 93 संविधान संशोधन 2005 है

अनुच्छेद 16 लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता
इसमें में कई सारी बातें कही गई है इस को ध्यान से पढ़ें
यह अति महत्वपूर्ण है खासकर स्टूडेंट्स के लिए
राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन या नियुक्ति से संबंधित विषयों में सभी नागरिकों के लिए अवसर की समता होगी

नियोजन या पद के संबंध में केवल धर्म मूल वंश जाति लिंग उद्भव जन्म स्थान निवास या इनमें से किसी के आधार पर न तो कोई नागरिक अपात्र होगा और ना ही इस पर किसी का भेदभाव होगा

इस अनुच्छेद की कोई भी बात संसद को कोई ऐसी विधि बनाने से निवृत नहीं करेगी जो किसी राज्य संघ राज्य क्षेत्र की सरकार के या उसमें के किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन वाले किसी वर्ग या वर्गों के पद पर नियोजन या नियुक्ति के संबंध में ऐसे नियोजन या नियुक्ति से पहले उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के भीतर निवास विषयक कोई अपेक्षा व्यक्त करती है

इसमें राज्य के पिछड़े हुए नागरिकों के किसी वर्ग के पक्ष में या जिनका प्रतिनिधित्व राज्य की राज्य में राज्य के अधीन सेवा में पर्याप्त नहीं है नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी

कुछ बातें इस अनुच्छेद में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में राज्य के अधीन सेवा से संबंधित की गई है

अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत

अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता के आधार पर किया गया कोई भी कार्य अपराध माना जाएगा और दंडनीय होगा

आर्टिकल 17 में मूल रूप से चार बातें हैं जो जाननी बहुत जरूरी है

अस्पृश्यता के आधार पर सार्वजनिक स्थान पर किसी व्यक्ति के प्रवेश पर रोक लगाना

 प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अस्पृश्यता का प्रचार करना ऐतिहासिक धार्मिक या किसी अन्य आधार पर अस्पृश्यता को न्याय संगत ठहराना

अस्पृश्यता के आधार पर किसी अनुसूचित जाति के सदस्य का अपमान करना

अस्पृश्यता के आधार पर किसी अनुसूचित जाति के सदस्य का अपमान करना
ऊपर दिए गए चार बातें बहुत जरूरी है सभी लोग ध्यान रखें किसी अनुसूचित जन जाति या अनुसूचित जाति के लोगों को पर कोई भी टिप्पणी नहीं करेगा

 अनुच्छेद 18  उपाधियों का अंत

यह आर्टिकल उपाधियों से संबंधित है कौन सी उपाधि लेनी है या नहीं लेनी है सैनी या शैक्षिक विशेषता को छोड़कर अन्य कोई भी पदवी राज्य द्वारा प्रदान नहीं की जाएगी और भारत का कोई भी नागरिक विदेशी राज्य से कोई पदवी स्वीकार नहीं करेगा
राज्य कोई उपाध्य पुरस्कार सामाजिक सेवा के लिए प्रदान कर सकता है पर इसे पदवी के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है

अनुच्छेद 19 स्वतंत्रता का अधिकार

 इस अनुच्छेद में हमें अभिव्यक्ति की आजादी मिली है इस मे 6 बातें जानना बहुत जरूरी है

1. वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

 2. शांति पूर्वक सभा करने का अधिकार बिना किसी           अस्त्र-शस्त्र के

 3. संस्था अथवा संघ बनाने का अधिकार 

4. समूचेभारतीय क्षेत्र में कहीं भी आने जाने का अधिकार

 5. भारत के किसी भी क्षेत्र में रहने और बसने का             अधिकार
6.  व्यापार करने का अधिकार







लिखना जारी,,,,,,,,,,

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